जीवन के
सबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप
की तरह आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी छोर पर बैठे
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उनदिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी ।
- ॐ राजपूत
०२-०३-२००१
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कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।
कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...
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1 comment:
bahut hi achhi lagi ..jeevan ke sundartam dinon me jiska sath ho uski yaaden to taumra hamare her safar ki humsafer hoti hain ....
dil ko choo gayi aapik rachna..!!
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