Thursday, March 3, 2011

तुम शहर में वापस आ गयी हो .


कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

Sunday, November 7, 2010

बुढ़िया

एक शब्द है
बुढ़िया
जो

आदरसूचक अर्थ नहीं रखता
मगर
अवस्थाबोध जरुर कराता है
जिसे भिखमंगे जैसी दया की
दरकार होती है
मेरी दादी वही हो गयी है
बुढ़िया
माँ की नज़रों में
वह काम नहीं कर सकती है
इसलिए
पापा कहते है
मुफ्तखोर
फ्लैट के उस कोने में
जहाँ
मै टॉमी को बांधता था
बिस्तर लगा है
बुढ़िया
यानि मेरी दादी का
माँ की जो साड़ी
पहले कामवाली बाई ले जाती थी
अब पहनती है
बुढ़िया
यानी मेरी दादी
कल जब सिन्हा आंटी आयी थी
तो
माँ ने कहा था
उनके गांव की है
बुढ़िया
वह हमेशा राम - राम जपती रहती है
डेली सोप के समय
माँ चीखती है
पागल बुढ़िया
चुप रहो
मै उससे मिल नहीं सकता
वह बीमार है
स्कूल से लौटने पर
उसे दूर से देख सकता हूँ
उसके हाथ कांपते रहते है
वह दिन में कई बार
अपनी गठरी खोलती है
टटोलती है
मानों कुछ
खोज रही हो
और फिर बंद कर देती है
माँ कहती है
काफ़ी भद्दी और लालची है बुढ़िया
एकदम देहाती गंवार है
मगर
बुढ़िया मेरेलिए आश्चर्य है
जब मुझे पता लगा
कि
वह मेरे पापा की माँ है
तो
मुझे विश्वास नहीं हुआ
क्या माँ ऐसी होती है ?
एक दिन
उसने मुझे
पास बुलाकर एक मिठाई दी
और कहा -" खा "
मै खाने को ही था
कि
माँ ने आकर
मेरे हाथ झटक दिए
कहा -
जहर है मत खा
फिर बुढ़िया से कहा
इस मिठाई की तरह
तुम्हारा दिमाग भी सड़ गया है
वह रोज नहीं नहा पाती
वह बदबू देती है
उसके बर्तन अलग हैं
महाराज उसके लिए
अलग से खाना बनाता है
बुढ़िया यानी
मेरी दादी से
कोई बात नहीं करता
सिवाय उस महरी के
जो झाड़ू लगाने आती है
फिर भी
वह बड़बड़ाती रहती है
कभी-कभी
वह रोने लगती है
जबकि
उसे कोई मारता नहीं है
माँ कहती है
नाटक
मैंने जब माँ से पूछा -
बुढ़िया
यहाँ क्यूँ आई है
तो
माँ ने हँसते हुए कहा -
मरने के लिए!
(एक बार फिर अपनी इस कविता को आपके लिए प्रकाशित कर रहा हूँ - ॐ राजपूत)

Saturday, November 6, 2010

समय ठहरा रहेगा तब तक

पूरी गर्मजोशी के साथ
मैं उस क्षण
भी
करूँगा तुम्हारा स्वागत
जब
शरीर मुर्झा चुकी होगी
आँखों ने बोलना
और
मस्तिष्क ने समझाना
बंद कर दिया होगा
एक-एक कर ढेरों
कलैंडर
उतर चुके होंगे दीवार से .
मैं दीवार पर
एक नया कलैंडर खिलाऊंगा
और फूलदान से
बासी फूलों को निकाल
उसमें
ताजे फूलों के साथ
शेष बची जिंदगी को भी
सजा दूंगा.
समय ठहरा रहेगा तब तक.

Thursday, November 4, 2010

और तुम भी


कभी ऐसा भी होता है

कभी ऐसा ही होता है
और
एक रौशनी चली जाती है
बिना किसी को प्रकाशित किये
फिर
हाथ जो बने है
स्पर्श को संज्ञा प्रदान करने के लिए
अनछुए ही लौट आते है
पहलु में
कभी - कभी कोई यायावर
पूरी तैयारी के बावजूद
कहीं नहीं जाता है
और
शहर का सबसे पढ़ा - लिखा व्यक्ति
मर जाता है
किताबों को आलमारी में कैद किये
इधर
रात के प्रहरी की आवाज़
गुज़र जाती है
कानों के बिलकुल करीब से
हम जागते नहीं
फिर
पागलों की जमात में बैठा
नया पागल कहता है
अभी भी वक़्त चाहिए
अभी भी ओ खुदा
तुम्हारी दुनिया बन ही रही है
और तुम भी ।

Tuesday, November 2, 2010

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

दुःख की घड़ी में
मेरे साथ रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
हाथों में लिए
ढाढ़स के अनगिणत शब्द
और
सुख के क्षण में
बिखरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
गंध और स्पर्श के सहारे
जब मैं कटता हूँ दुनिया से
एकमात्र
मेरी कविता मुझसे जुड़ती है
अनुभूति की बाहें फैलाकर
और
जब मैं रमता हूँ दुनिया में
मेरी कविता ही बनती है
माध्यम
अभिव्यक्ति की
शोक में हर्ष में
अपकर्ष और उत्कर्ष में
रण और वन में
हरपल मेरे मन में
विचरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
मैं समाता हूँ
अपनी कविता की इयत्ता में
और यही
दुनिया में अकेली
मेरी परवाह करती है
मैं देता हूँ इसे
रूप
यह देती है मुझे
परिभाषा
दुनिया के सारे
अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग
उस मुकाम पर
पहुँचने का साधन मात्र है
जहाँ
मैं और मेरी प्रेयसी
निर्बाध मिल सके
मेरी प्रेयसी कविता
मेरी अंतिम खोज है .



 

Sunday, October 31, 2010

माँ की बाँहों में

`सुबह की अलसाई नींद
बिस्तर से उतरती है
डगमगाते पैरों की मानिंद
लेती है टेक
आँख खुलने की सच्चाई
आईने पर पसर जाती है
और
रौशनदान से
सूरज की पेशी
पिता की अदालत में
जिंदगी भर देता है
और
एक एक कर
बेपरवाह होने की वजह से
सिमट जाती है
मेरी उम्मीद
माँ की बाँहों में
जो कि
पहली साँस से अनवरत
मुझमे जान फूंकती रही है
और फिर
माँ की हँसी की डोर थामे
उड़ चढ़ता हूँ मैं
आसमान में
और ऊँचा और ऊँचा
उस पतंग की तरह
जिसकी जिंदगी शाम होने पर भी
आसमान से नहीं उतरती

माँ सी धरती

एक नदी उसके गर्भ में
और
सीने में दूध
उसकी जिंदगी से मिलती
साँस
गोद में बसती है नींद
झरनों की लोरी
हवाओं की थपकी
हमें छुपाकर जिन्दा करती
माँ सी धरती .

कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।

  कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...