Thursday, July 30, 2020
Sunday, June 21, 2020
समाजवाद से आगे की कोई चीज है बरसात।
Thursday, June 11, 2020
पगडंडी
Friday, June 5, 2020
इन्हीं मायनों ने हमें जानवर रहने नहीं दिया है।
Thursday, October 17, 2019
शोर का सन्नाटा है कि...
Saturday, September 7, 2019
कविता से पहले दुरुस्त हो लें। ( डिस्क्लेमर:- मर्दवादी।)
कविता में बचे रहने के लिए
मुझे खोजना पड़ता है गेहूं का बारहमासी पौधा।
जिसमें पूरे परिवार की भूख निर्भर है।
इससे बनी रोटी
सिर्फ पेट की नहीं,
घर की भी जरूरत है।
ये कपड़ा भी बन जाता है,
छत भी,
स्कूल की फीस भी,
डॉक्टर की हिस्सेदारी भी,
नजराना भी यही है
और
जुर्माना भी।
इतना करके कविता में बचा हूँ,
शब्दों को नए-नए अर्थ में
पिरोने से पहले
पेट को भरना जरूरी है।
नहीं तो शब्द छुप से जाते हैं।
या फिर भागते दिखते हैं।
विद्रोह के शब्दों से भी
चारण गीत बजने लगता है।
विशाल बरगद की छाँह सुहानी लगने
लगती है।
देखते-देखते पसीना निकलना बंद हो जाता है,
वातानुकूलित माहौल आदी होते ही
शब्द सुस्ताने लगता है।
फिर जुगत की तलाश में
हम भदेस गाली देते हैं।
और हमारे बाजू वाले आलोचक फतवा देते हैं,
कविता यही है।
हमारी नजर घड़ी पे जाती है।
दिन
महीना
साल पे।
इससे पहले कि कवि के चुकने की
घोषणा हो,
हमारा ठंडा-ठंडा कमरा असहिष्णु होता जाता है।
हम अपने स्कूल में नए-नए आए हुए रंगरूट
को
हरी झंडी दिखा
दूसरे के ट्रोल को बेनकाब करने में लग जाते हैं।
पुरानी पड़ी
भुला दी गई
पुरस्कार के वापसी की घोषणा करते हैं,
राशि को खरचते हुए।
उम्मीद यही कि
हमारी रोटी हमें मिलती रहे।
इसीलिए
जरूरी है
कि कविता करने से पहले
कम से कम
घर की छत पे ही गेहूं उगा लें,
रोटी जुटा ले।
कविता करने के दौरान
और बाद में रोटी की तलाश
बड़ी महंगी है।
आपकी रूह बिक सकती है।
हमारा जायका बिगड़ सकता है।
Tuesday, June 11, 2019
हे युधिष्टिर
हे युधिष्ठिर
हम प्रणाम करते हैं तुम्हें
अपने कुलदेवता की तरह
हम सबमें तुम बसे हो
धर्मराज बने रहने के लिए
हमने तुम्हारी भाषा अपना ली है
हम बचा लेते हैं कथन को
झूठ होने से
जो सच भी नहीं होता है।
इस तरह
मन मैला नहीं होता
ग्लानि भी नहीं
उद्देश्य पूरा हो जाता है
कोई अंगुली भी नहीं उठा पाता है।
कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।
कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...
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एक शब्द है बुढ़िया जो आदरसूचक अर्थ नहीं रखता मगर अवस्थाबोध जरुर कराता है जिसे भिखमंगे जैसी दया की दरकार होती है मेरी दादी वही हो गयी ...
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`सुबह की अलसाई नींद बिस्तर से उतरती है डगमगाते पैरों की मानिंद लेती है टेक आँख खुलने की सच्चाई आईने पर पसर जाती है और रौशनदान से सूरज की पे...
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चलो निकलो घर से छुटभैये कवि अपनी दो टके की सतही कविता के साथ इस क्रांति में वे ही असरदार होंगे खालिस तुकबंदी भी चलेगी और पैरोडी भी विचारधार...