Thursday, June 11, 2020

पगडंडी

वे तो बस नियमित चला करते रहे
उन्हें पता भी नहीं था 
कि 
उनके चलने से भी निशान बनते हैं
छोटी सी पगडंडी है 
इसे कुछ एक से जाने पहचाने लोगों ने 
आदतन नंगे पांव चलकर बनाया है 
पहले पहल झाड़-झाड़ी दबे
तलवे तले हरी घास पीली हुई 
फिर मिट्टी की एक लकीर खिंच गई
यही लकीर पगडंडी बन गई।
क्योंकि 
नंगे पैरों में एक अपना अनुशासन था
उसकी थाप वहीं पड़ते रहे 
जहां पड़ा करते थे 
अक्सर बनती है पगडंडियां
खेतों से होकर 
इसलिए पता होता है 
चलने वालों को अपना दायरा
एक कदम भी इधर-उधर होने से
पौधों की दुनिया में आपका अतिक्रमण हो सकता है 
पगडंडियां वही बनेगी और बची रहेगी
जहां भीड़ ने अपने पैरों से कभी हमला न किया हो
 बूटों के गर्म दाग न लगे हों
और 
दनदनाती गोली की तरह 
मोटर लगी किसी दो पहिया वाहन ने
निशाना न बनाया हो
जो नहीं  जा सकते किराए की गाड़ी से 
और 
जिन्हें अपना सामान 
अपने ही सर पर उठाना होता है
उनके लिए ये पगडंडी एक सहज सवारी की तरह है 
गांव के संपन्न लोग अपनी गाड़ी से 
जितने समय में सड़क होकर सदर बाजार पहुंचते हैं 
उससे भी कम समय में 
पगडंडी की सवारी कर बाजार पहुंचा जा सकता है 
सड़क की सवारी करने वाले भी
पगडंडी का लेते रहे हैं सहारा
मगर
उनसे कभी कोई पगडंडी बन नहीं पाया है
किसी भी सरकारी दस्तावेज में 
पगडंडी का कोई जिक्र नहीं मिलता है 
और ना ही 
किसी योजना से उस पर कोई काम हुआ है 
असल में तो 
सरकारी योजना से पगडंडी बन भी नहीं सकती
या यूं कहिए कि 
सरकारी योजना से कोई राह नहीं निकल पाने के कारण ही
पगडंडी बना करती है
पगडंडी कभी सदा के लिए नहीं बनती
इसका कोई इतिहास  नहीं है 
इसका भविष्य भी नहीं है 
इसे सुरक्षित रखने का भी कोई रिवाज नहीं है 
जबकि सहूलियत के रूप में 
हमेशा से काम आता रहा है
मगर किसी बड़े महापुरुष के नाम पर 
आज तक किसी ने भी 
कभी पगडंडी का कोई नामकरण नहीं किया है 
बेनाम रह जाती है पगडंडी 
और शायद इसीलिए 
इसके योगदान का कोई मूल्यांकन नहीं करता 
जरूरत में पगडंडी ने कितना साथ दिया 
इस पर कोई नहीं सोचता 
हमारे जीवन का अहम हिस्सा रही है पगडंडी 
मगर जब हमें कोई बड़ा काला सा सड़क दिखता है 
जिसके किनारों पर उजली पट्टियां चमकती हो 
हम खुश हो जाते हैं अपनी प्रगति पर 
पगडंडी हमारे पिछड़ेपन की निशानी बनकर रह जाती है
काली सड़क ने हमेशा
रफ्तार वाली पहियों को सहारा दिया है
नंगे पैरों को हमेशा जलाया है
नंगे पैरों ने हमेशा पगडंडियों को चाहा है।
अब जबकि मजबूरी में पैदल चलना
पिछड़ेपन की निशानी है
मेरी
कविता की पगडंडी 
पगडंडी की कविता
कई लेन वाली पक्की चौड़ी सड़क  के बीच 
और कितने दिनों तक अपना अस्तित्व बचा पाएगी 
या कि बना भी पाएगी
इसपर संदेह है पर अफसोस नहीं है।

Friday, June 5, 2020

इन्हीं मायनों ने हमें जानवर रहने नहीं दिया है।

जब हमारे पास किसी को मारने का
कोई कारण नहीं होता
और
हम मार देते हैं
हम जानवर नहीं होते हैं,
इंसान होते हैं।
हजारों साल से हम इंसान हैं।
हजारों साल रहेंगे।
हमारे पूर्वज  जितने समय तक निर्दोष रहे
जानवर थे
वन गुफा कंदराओं जंगलों में रहते थे।
फिर हममें लालच पैदा हुआ
हम इंसान हो गए।
हमें जज्बाती दुनिया से निकाल दिया गया।
अब हमने
मतलब की दुनिया उगा रक्खी है।
जहां
प्यार करना
नफरत करना
हँसना,रोना
सबके मायने होते हैं।
इन्हीं मायनों ने हमें जानवर रहने नहीं दिया है।

Thursday, October 17, 2019

शोर का सन्नाटा है कि...

शोर का सन्नाटा है कि
हमें हमारे हक़ की आवाज़ डराने लगी है, 
कान फटने लगता है।
तेज रौशनी के अंधेरे में 
हमारा खुद का चेहरा छुप सा गया है, 
नहीं दिख रहा है कि किधर जा रहे हैं, 
हमारे हाथों से क्या हो रहा है।
ज्ञान की अज्ञानता ने 
हमारे वर्तमान को इतिहास के पन्ने में भटका दिया है। 
भारी किताबों के भरकम पन्नों से 
अभी तक के सभी सूत्र बिखर गए हैं।
खाये पिये अघाये लोगों की भूख ने 
रोटी को 
इतना मंहगा कर दिया है कि
इस सदी की सबसे अधिक भूखी रातें 
हमारे हिस्से में टकटकी लगाए गुजरती है।
साहसी लोगों की कायरता ने 
एक बार फिर से मुल्क को लुटने के लिए निहत्था छोड़ दिया है। हथकड़ीऔर बेड़ियां 
रोज रोज भीमकाय होती हुई 
भीड़ की भीड़ को निगलती जा रही है।
भीड़ की तन्हाई ने इतना अकेला कर दिया है 
कि जहां एक हाथ बढ़ाने भर से गिरते को 
गिरने से बचाया जा सकता था 
वहां भी हजार की मौजूदगी में 
एक निहत्था जान नहीं बचा पाता है।
कथित देवताओं की शैतानी से 
हमारी धार्मिक आस्थाएं दरकती हुई ढहने लगी है। 
हमने जो ऋचाओं से दिन की शुरुआत की थी, 
एक भद्दी गाली के साथ खत्म कर रहे हैं अंधेरे में ।
लोकतंत्र के अधिनायकत्व में, 
समाजवाद की विलासिता में 
बिचारि जनता 
मतदान केंद्र की ओर बढ़ती हुई लगातार भटकती जा रही है
और उसके हाथ की अंगुली से निकल के प्रभुसत्ता 
स्याह निशान छोड़ते हुए 
जाति 
तो मजहब 
तो पैसे 
तो दारू से नाजायज़ रिश्ता बनाती
हमारी उम्मीदों पे रंगरेलिया मना रही है।
और हम हैं कि भरोसे की दग़ाबाज़ी से लहूलुहान होते हुए भी
सुकून से सो जाते हैं।

Saturday, September 7, 2019

कविता से पहले दुरुस्त हो लें। ( डिस्क्लेमर:- मर्दवादी।)

कविता में बचे रहने के लिए
मुझे खोजना पड़ता है गेहूं का बारहमासी पौधा।
जिसमें पूरे परिवार की भूख निर्भर है।
इससे बनी रोटी
सिर्फ पेट की नहीं,
घर की भी जरूरत है।
ये कपड़ा भी बन जाता है,
छत भी,
स्कूल की फीस भी,
डॉक्टर की हिस्सेदारी भी,
नजराना भी यही है
और
जुर्माना भी।
इतना करके कविता में बचा हूँ,
शब्दों को नए-नए अर्थ में
पिरोने से पहले
पेट को भरना जरूरी है।
नहीं तो शब्द छुप से जाते हैं।
या फिर भागते दिखते हैं।
विद्रोह के शब्दों से भी
चारण गीत बजने लगता है।
विशाल बरगद की छाँह सुहानी लगने
लगती है।
देखते-देखते पसीना निकलना बंद हो जाता है,
वातानुकूलित माहौल आदी होते ही
शब्द सुस्ताने लगता है।
फिर जुगत की तलाश में
हम भदेस गाली देते हैं।
और हमारे बाजू वाले आलोचक फतवा देते हैं,
कविता यही है।
हमारी नजर घड़ी पे जाती है।
दिन
महीना
साल पे।
इससे पहले कि कवि के चुकने की
घोषणा हो,
हमारा ठंडा-ठंडा कमरा असहिष्णु होता जाता है।
हम अपने स्कूल में नए-नए आए हुए रंगरूट
को
हरी झंडी दिखा
दूसरे के ट्रोल को बेनकाब करने में लग जाते हैं।
पुरानी पड़ी
भुला दी गई
पुरस्कार के वापसी की घोषणा करते हैं,
राशि को खरचते हुए।
उम्मीद यही कि
हमारी रोटी हमें मिलती रहे।
इसीलिए
जरूरी है
कि कविता करने से पहले
कम से कम
घर की छत पे ही गेहूं उगा लें,
रोटी जुटा ले।
कविता करने के दौरान
और बाद में रोटी की तलाश
बड़ी महंगी है।
आपकी रूह बिक सकती है।
हमारा जायका बिगड़ सकता है।

Tuesday, June 11, 2019

हे युधिष्टिर

हे युधिष्ठिर
हम प्रणाम करते हैं तुम्हें
अपने कुलदेवता की तरह
हम सबमें तुम बसे हो
धर्मराज बने रहने के लिए
हमने तुम्हारी भाषा अपना ली है
हम बचा लेते हैं कथन को
झूठ होने से
जो सच भी नहीं होता है।
इस तरह
मन मैला नहीं होता
ग्लानि भी नहीं
उद्देश्य पूरा हो जाता है
कोई अंगुली भी नहीं उठा पाता है।

सिमरिया- जितना याद किया।

गाँव में अगर कोई मर जाए तो उसे जलाने के लिए सिमरिया ले जाना पड़ता था। जाया तो झमटिया भी जा सकता था, मगर झमटिया जाने का मतलब था कि आपकी माली हैसियत इतनी कमजोर है कि  आपसे छुप भी नहीं रहा । या फिर आप अपने संबंधी के अंतिम क्रियाक्रम को निपटाना भर चाहते हैं।
सिमरिया जाने का मतलब होता था कि आप अपने संबंधी को दिल से चाहते हैं और आपके पास खर्चने को रुपैया भी है। दाह संस्कार, विशाल नदी गंगा में स्नान और उसके बाद पूरी जलेबी का छककर भोग, यही था बचपन में मेरे लिए सिमरिया।
ओकील बाबा ( सबसे छोटे दादा जी) की मृत्यु के बाद पहली बार होश में सिमरिया जाने का मौका मिला था। वैसे तो मेरा मुंडन संस्कार झमटिया में हुआ था मगर बचपने में भी एकाध बार सिमरिया गया जरूर था। मेरे लिए सिमरिया का यही था पहला बोध।
" दो में से तुम्हें क्या चाहिए, कलम या कि तलवार।"
          बचपन में तलवार मेरा पसंदीदा खिलौना था। गत्ते वाली कॉपी से गत्ता निकाल के और कपड़े की दुकान से कूट मांग के तलवार बनाया करता था। फिर मध्यांतर में सहपाठी के साथ मिलके लड़ता भी था और जीत भी हासिल कर लेता था। जीत विरोधी की भी हो जाती थी। मगर हमारी तलवार दूसरे दिन के लिए बेकार हो जाती थी।बचपन से कलम का भी शौकीन रहा हूँ। जब भी कोई कुछ पैसा देता था तो उससे कलम ही खरीदता था। यह शौक आज भी बरकरार है।
           इसलिए दिनकर की यह कविता बचपन में मुझे प्रिय तो बहुत थी मगर परेशान भी खूब करती थी। मुझे तलवार और कलम दोनों चाहिए था और कविवर एक की बात करते थे। दिनकर से मेरा परिचय इसी कविता के माध्यम से हुआ था। दिनकर मेरे पहले प्रिय कवि थे। हमलोग दलसिंहसराय में आकर बस गए थे। हमारा पुश्तैनी गाँव नैपुर बेगूसराय जिले में ही है। दिनकर भी बेगूसराय से थे इसलिए स्कूल में जब दिनकर को पढ़ा और पढ़ाया जाता था तो मैं आत्मीय बोध से भर जाता था। लगता था कि लोग मेरे रिश्तेदार की बात कर रहे हैं। मगर फिर भी छात्र जीवन में मैंने दिनकर को उतना ही पढ़ा जितना पाठ्य पुस्तक में मिला। दिनकर का गाँव सिमरिया है, यह बचपन से जानता था। और यही था मेरे जीवन में सिमरिया का दूसरा बोध।
   जब नौकरी मिली तो पहली पोस्टिंग बरौनी ब्लॉक में हुई। उसी बरौनी में जहाँ सिमरिया है, वही सिमरिया जहाँ पुरखों की आत्मा बसी है, जो दिनकर का घर भी है। अब पता चला कि सिमरिया को जितना जानता था उससे काफी बड़ा है सिमरिया।  धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य और राजनीति को अपने में समाए सिमरिया तीन पंचायतों में फैला है।
मिथिला का मुक्तिधाम, कल्पवास और आदिकुम्भ स्थली सिमरिया, मल्हीपुर दक्षिण पंचायत में है। राष्ट्रकवि दिनकर का सिमरिया, सिमरिया एक पंचायत में है। सामाजिक न्याय का झंडा उठाए , अंध परंपरा और अंध विश्वास को चुनौती देता सिमरिया , सिमरिया दो पंचायत में है।
                    बेगूसराय और बिहार की राजनीति में बीहट की अपनी पहचान है। राम चरित्र बाबू से लेकर आज के कन्हैया कुमार तक बीहट की पहचान कायम है। इसके बावजूद मैं सिमरिया के विस्तार में ही बीहट को भी याद रखना चाहता हूँ। कदाचित बीहट भी सिमरिया को खुद से अलग कर देखना पसंद नहीं करेगा।
       अपने कार्यकाल में इस सिमरिया से कई रूप में जुड़ने का मौका मिला। प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए तीन कल्पवास और एक कुम्भ के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाने मौका मिला। सम्पूर्ण मिथिलांचल से, नेपाल से जब हजारों कल्पवासी एक - डेढ़ महीने के लिए सिमरिया के गंगा तट पे कल्पवास के लिए आते हैं , तो उनके लिए मूलभूत सुविधा की व्यवस्था करना एक प्रशासनिक चुनौती है। इस चुनौती को पूरा करने में सहायक के रूप में मैं कितना सफल रहा इसका आकलन तो दूसरे करेंगे । मगर मैं पूरी जिम्मेवारी के साथ यह तो कह ही सकता हूँ कि स्थानीय मुखिया रंजीत कुमार और उसकी टीम के सहयोग के बिना हमारे लिए कुछ भी कर पाना कठिन था।
    राजकीय सम्मान के साथ राष्ट्रकवि दिनकर को जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पे याद करना मेरे लिए महज प्रशासनिक दायित्व कभी नहीं था। इसी कड़ी में पहली बार दिनकर की जन्मभूमि सिमरिया से जुड़ने का अवसर मिला। सितंबर 2014 में जब पहली बार सिमरिया मध्य विद्यालय में दिनकर जयंती समारोह में बोलने का अवसर मिला तो वर्षों से सोई मेरी साहित्यिक चेतना को फिर से जगने का मौका मिल गया। मुझे याद है जब पहली बार दिनकर जयंती के आयोजन के सिलसिले में मुचकुंद जी का फ़ोन आया था। बिना देखे मुचकुंद जी की जो छवि मैंने अपने मन मे गढ़ी थी, मुचकुंद जी से मिलने पे वो छवि ताड़-ताड़ हो गई। अपनी भदेस पहचान में बिल्कुल सादगी के साथ सामान्य कद काठी के एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि मैं ही मुचकुंद हूँ तो सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यही वो आदमी है जो इतने बड़े आयोजन को नेतृत्व प्रदान कर रहा है। जहाँ देश के इतने नामी गिरामी साहित्यकार शिरकत कर रहे हैं। सिमरिया गाँव में घूमने के दौरान हर घर की दीवार पे जब दिनकर की पंक्तियों को लिखा देखा तो महसूस हुआ कि सारा गांव दिनकर की पुस्तक का रूप ले लिया है। गांव का हर घर पुस्तक का पन्ना बना हुआ है। गाँव में स्थित दिनकर पुस्तकालय और सभाभवन मेरे लिए गौरव का विषय बन गया। दिनकर जी के घर को देखने के बाद और वहाँ केदार बाबू से मिलने के बाद मुझे लगा कि आज मेरा तीर्थ पूरा हो गया है।

क्रमशः.....

नये जमाने का 'संजय

कुछ मत देखो तो साबुत बच पाओगे।
फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप्प से दूर रहो
तो
जीवन का ककहरा याद रहेगा।
जो जीवट नहीं हैं
जिनके पांव अंगद के नहीं हैं।
उन्हें सूखे पत्ते की तरह
इस
इधर-उधर
उड़ाता रहेगा
नये जमाने का 'संजय'।
नारद की तरह
दोनों की बात
कुछ अपनी भी लगा के कहेगा।
फिर कहीं की तस्वीर कहीं की
कहानी सुनाएगी।
फिर कही की खबर कहीं और से आएगी।
घर के अंदर से मुहल्ले में हलचल हो सकती है
और मुहल्ले की साजिश से किसी का
घर उजड़ सकता है।
फिर अपनी माँ से गौ माता ज्यादा प्यारी
हो जाती है।
और वंदे मातरम बोलने से ईमान
बिगड़ जाता है।
फिर रंगों का बंटवारा कर
झंडों को उठाया जाता है।
नीला हरा केसरिया
से जीवन का फर्क उभरता है।
जिसने भीड़ को ठुकराया
भीड़ के हाथों मरता है।

कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।

  कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...