Monday, October 25, 2010

संजीवनी है तुम्हारी आहट

संजीवनी है तुम्हारी आहट
जिससे जिन्दा होती है मेरी वैयक्तिकता
मै जो करते-करते कार्य
हो जाता हूँ यंत्र,
तब
सामान्य होने का सुख बटोरता हूँ
जब
तुम देती हो
एक छोटी आवाज़
झील के उस पार से
इधर
कमरे में ताज़ी हवा घुस आती है
पुस्तकों में सिमटे शब्द
बिस्तर पर उतर आते हैं
और मैं
करीने से पलटता हूँ
फिर से
अपनी जिंदगी की किताब को
दुनिया की असंख्य संबोधनों में से
यह एक काफी है
जो मुझे मरने नहीं देगी
खास मेरे लिए
जब एक स्वर तैरती है
तुम्हारी
मंदिर में बजती है भोर की घंटी
नदी में उठती है कुंवारी लहर
हवा सोये फूलों को जगा जाती है
और मैं
फिर से गढ़ता हूँ एक परिभाषा
अपने लिए
क्योंकि
जिंदगी ने कम ही दिए हैं
ऐसे मौके
जब
मेरी संवेदना मेरे शरीर को महसूस करती है .

Saturday, October 23, 2010

जो धुँआ उठ रहा है

जब पहचान ही खतरा हो
और भीड़ दंगाई हो
शब्द चुप हो जाते है
मादरे - जुबान की
हम दुबकते हैं नकली खाल में
दोस्त और दुश्मन की सरहद
लथपथ राहों को रोक देती है
फिर क्या गरज
कि
जो धुँआ उठ रहा है
उसमे स्वाद है रोटी के बनने की
या दुर्गन्ध है
चूल्हे के जलने की .

Friday, October 22, 2010

मुफलिसी की नवाबी

जीवन के
सबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप की तरह
आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी भी छोड़ पर बैठ
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उन दिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी

यदि आप यह दावा करते हैं

यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप देख सकते हैं
तब
आपकी आँखे पथरायी
क्यों नहीं है
और
यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप बोल सकते हैं
तो
आपकी आवाज़ बैठी क्यों नहीं है
इक्कीसवीं सदी में जिन्दा होने की
मुनादी करवाने वाले आप
मर क्यों नहीं पा रहे हैं
यदि बात ऐसी है तो
आप भी संदेह के परे नहीं है
और
इतिहास
आपकी भागीदारी को भी दर्ज करेगा
क्योंकि
इस बुरे माहौल में
आपने
जीने का तरीका ढूंढ़ लिया है.

Tuesday, October 19, 2010

तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कुछ शब्द

कुछ शब्द
तुम्हे सौंपा था
मैंनेअपना समझ कर
और
तुम्हारे हाथ से
वे छिटक गए
क्योंकि
उनका अर्थ लगाना आसान था

पगडण्डी

घर मेरा बसा है
बस्ती से दूर किसी के पास
जिसके चारो ओर पगडण्डी है
यादों की
जिससे होकर गुजरना
जिंदगी को कई बार जीना है


कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।

  कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...