Friday, October 15, 2010
उम्मीद की लत
Thursday, October 14, 2010
कविता की रेजगारी
मेरे हाथ से छूटते शब्द
Sunday, October 10, 2010
तरक्की पसंद कविता .
केवल
कुछ कम गलती है
मेरे
तेरे ?
राजा एक हो सकता है
या
सात हजार सात सौ सात
पर
परजा की बात
तो
करोड़ों में जाती है
फिर भी
नयी रौशनी नहीं आती है ।
राजा के
सेवक
लठैत
मुनीम
गुमाश्ता
पंडित
हरकारा
में हम नहीं है ।
राजा का उतरन पहनने वाला
कम नहीं है ।
बाहर
राजा जिसे अखरता है ।
घर में
राजा की नक़ल नहीं करता है ?
बाहर
अराजकता
लूट
अन्याय
का शोर है
पर
सच पूछो तो
हमारे अन्दर भी एक चोर है
जो
भूख के नाम पर छीन लाये
रोटी को
खुद डकार जाता है
मगर
वादें लेनिन की करता है ।
कसमें माओ की खाता है ।
३१ -८ - २०१०
Saturday, October 9, 2010
bihar chunaw
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो
bihar chunaw
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो
Wednesday, October 6, 2010
औरत
औरत
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वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है?
गूँध रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गई,
एड़ी घिस रही है
एक औरत अनन्त पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है
एक औरत अंधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोई है
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।
- चन्द्रकान्त देवताले
कविता :-एक दिन मनुष्य भी हमारी अनुमति से खत्म हो जाएगा।
कितना मुश्किल होता है किसी को न बोल पाना हम कितना जोड़ रहे हैं घटाव में। बेकार मान लिया जाता है आदतन अपने समय में और अपनी जगह पर जीना किसी ...
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एक शब्द है बुढ़िया जो आदरसूचक अर्थ नहीं रखता मगर अवस्थाबोध जरुर कराता है जिसे भिखमंगे जैसी दया की दरकार होती है मेरी दादी वही हो गयी ...
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`सुबह की अलसाई नींद बिस्तर से उतरती है डगमगाते पैरों की मानिंद लेती है टेक आँख खुलने की सच्चाई आईने पर पसर जाती है और रौशनदान से सूरज की पे...
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चलो निकलो घर से छुटभैये कवि अपनी दो टके की सतही कविता के साथ इस क्रांति में वे ही असरदार होंगे खालिस तुकबंदी भी चलेगी और पैरोडी भी विचारधार...