Sunday, October 31, 2010

माँ की बाँहों में

`सुबह की अलसाई नींद
बिस्तर से उतरती है
डगमगाते पैरों की मानिंद
लेती है टेक
आँख खुलने की सच्चाई
आईने पर पसर जाती है
और
रौशनदान से
सूरज की पेशी
पिता की अदालत में
जिंदगी भर देता है
और
एक एक कर
बेपरवाह होने की वजह से
सिमट जाती है
मेरी उम्मीद
माँ की बाँहों में
जो कि
पहली साँस से अनवरत
मुझमे जान फूंकती रही है
और फिर
माँ की हँसी की डोर थामे
उड़ चढ़ता हूँ मैं
आसमान में
और ऊँचा और ऊँचा
उस पतंग की तरह
जिसकी जिंदगी शाम होने पर भी
आसमान से नहीं उतरती

माँ सी धरती

एक नदी उसके गर्भ में
और
सीने में दूध
उसकी जिंदगी से मिलती
साँस
गोद में बसती है नींद
झरनों की लोरी
हवाओं की थपकी
हमें छुपाकर जिन्दा करती
माँ सी धरती .

Friday, October 29, 2010

फिर तुम्हारी याद दस्तक हुई सी जाती है

फिर तुम्हारी याद
दस्तक हुई सी जाती है
और
सिरहाने में सोये
किताब के पन्ने
जी उठते हैं
मेरे जीवन में घटी
जिन घटनाओ के नीचे
लाल स्याही से
तुमने एक लकीर डाली थी
महत्वपूर्ण
हर वह वाकया
इसी किताब में तो रहता है
जिसके हर पन्ने पर
चाँद अपनी चाँदनी
बिखेरता रहता है
फूल
खुद ही आकर
जहाँ खिल उठते हैं
बहार
पूरे बरस बनी रहती है
तुम्हारी याद
इसी कारण
अपनी छुट्टियाँ मनाती है
इस
किताब को जगाकर.

Wednesday, October 27, 2010

कल के चूल्हे के लिए.

एक कवि की आयु छोटी होती है
फिर जो बचता है
वह
एक समझौता है
अवसर और जुगत की जुगलबंदी
जहाँ मुक्तिबोध लोग नहीं ठहरते
एक बार लिखा जाने के बाद
शब्द के अर्थ
निकल चुके होते हैं
केवल वर्तनी ढोयी जाती है.
ताश के पत्ते सरीखा
फेंटा जाता है
शब्द
जिसके बासीपन पर
हरे रंग का लेप लगा
बाजार से ख़रीदे
पानी का छिड़काव किया जाता है
ताकि
पश्चाताप की बेला में
लगे कि
अब भी मुमकिन है
अपनी कविता को बचा पाना
क्योंकि
हम नहीं जानते
कविकर्म का पाप
बनारस में धुलेगा कि नासिक में
पर
लम्बी आयु के दबाव में
कही
लिखी कविता का अर्थ
गुम न हो जाये
इसलिए
हम राख कि ढेर में
छुपा लेते हैं आग
इसतरह बचती है
जिंदगी
कल के चूल्हे के लिए.

कल के चूल्हे के लिए.

एक कवि की आयु छोटी होती है
फिर जो बचता है
वह
एक समझौता है
अवसर और जुगत की जुगलबंदी
जहाँ मुक्तिबोध लोग नहीं ठहरते
एक बार लिखा जाने के बाद
शब्द के अर्थ
निकल चुके होते हैं
केवल वर्तनी ढोयी जाती है.
ताश के पत्ते सरीखा
फेंटा जाता है
शब्द
जिसके बासीपन पर
हरे रंग का लेप लगा
बाजार से ख़रीदे
पानी का छिड़काव किया जाता है
ताकि
पश्चाताप की बेला में
लगे कि
अब भी मुमकिन है
अपनी कविता को बचा पाना
क्योंकि
हम नहीं जानते
कविकर्म का पाप
बनारस में धुलेगा कि नासिक में
पर
लम्बी आयु के दबाव में
कही
लिखी कविता का अर्थ
गुम न हो जाये
इसलिए
हम रख कि ढेर में
छुपा लेते हैं आग
इसतरह बचती है
जिंदगी
कल के चूल्हे के लिए.

तुम शहर में वापस आ गयी हो . (once more)

कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

Monday, October 25, 2010

संजीवनी है तुम्हारी आहट

संजीवनी है तुम्हारी आहट
जिससे जिन्दा होती है मेरी वैयक्तिकता
मै जो करते-करते कार्य
हो जाता हूँ यंत्र,
तब
सामान्य होने का सुख बटोरता हूँ
जब
तुम देती हो
एक छोटी आवाज़
झील के उस पार से
इधर
कमरे में ताज़ी हवा घुस आती है
पुस्तकों में सिमटे शब्द
बिस्तर पर उतर आते हैं
और मैं
करीने से पलटता हूँ
फिर से
अपनी जिंदगी की किताब को
दुनिया की असंख्य संबोधनों में से
यह एक काफी है
जो मुझे मरने नहीं देगी
खास मेरे लिए
जब एक स्वर तैरती है
तुम्हारी
मंदिर में बजती है भोर की घंटी
नदी में उठती है कुंवारी लहर
हवा सोये फूलों को जगा जाती है
और मैं
फिर से गढ़ता हूँ एक परिभाषा
अपने लिए
क्योंकि
जिंदगी ने कम ही दिए हैं
ऐसे मौके
जब
मेरी संवेदना मेरे शरीर को महसूस करती है .

Saturday, October 23, 2010

जो धुँआ उठ रहा है

जब पहचान ही खतरा हो
और भीड़ दंगाई हो
शब्द चुप हो जाते है
मादरे - जुबान की
हम दुबकते हैं नकली खाल में
दोस्त और दुश्मन की सरहद
लथपथ राहों को रोक देती है
फिर क्या गरज
कि
जो धुँआ उठ रहा है
उसमे स्वाद है रोटी के बनने की
या दुर्गन्ध है
चूल्हे के जलने की .

Friday, October 22, 2010

मुफलिसी की नवाबी

जीवन के
सबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप की तरह
आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी भी छोड़ पर बैठ
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उन दिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी

यदि आप यह दावा करते हैं

यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप देख सकते हैं
तब
आपकी आँखे पथरायी
क्यों नहीं है
और
यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप बोल सकते हैं
तो
आपकी आवाज़ बैठी क्यों नहीं है
इक्कीसवीं सदी में जिन्दा होने की
मुनादी करवाने वाले आप
मर क्यों नहीं पा रहे हैं
यदि बात ऐसी है तो
आप भी संदेह के परे नहीं है
और
इतिहास
आपकी भागीदारी को भी दर्ज करेगा
क्योंकि
इस बुरे माहौल में
आपने
जीने का तरीका ढूंढ़ लिया है.

Tuesday, October 19, 2010

तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कुछ शब्द

कुछ शब्द
तुम्हे सौंपा था
मैंनेअपना समझ कर
और
तुम्हारे हाथ से
वे छिटक गए
क्योंकि
उनका अर्थ लगाना आसान था

पगडण्डी

घर मेरा बसा है
बस्ती से दूर किसी के पास
जिसके चारो ओर पगडण्डी है
यादों की
जिससे होकर गुजरना
जिंदगी को कई बार जीना है


Friday, October 15, 2010

उम्मीद की लत

शायद हाँ
तुमने लगा दी
उम्मीद की लत
और मेरे हिस्से की हंसी
जो गुम हो गयी थी
एक अजनबी के चेहरे
पर खिलती मिली
मैं फिर से मांग लाया
बरस बाद खुद को हंसाया

Thursday, October 14, 2010

कविता की रेजगारी

जवानी में उसने एक बार समुद्र में
पेशाब किया
और अपना शेष जीवन उसके परिणामस्वरूप
समुद्र की ऊँचाई कितनी बढ़ गयी
यह नापने में खर्च किया

मेरे हाथ से छूटते शब्द

शाम के धुंधलके में
उस दीवार पर
चस्पां दिया गया
फरमान
चाहो तो चले जाओ
अथवा मर जाओ
जहाँ
प्रेमियों ने अपने हाथों
इबारत उगाई थी
मुझे
जिंदगी देने वाली हाथ ने कहा
- हम तुम्हारे कोई नहीं
वक़्त का सूरज
काले लिबास में धंस गया
आँखों की रौशनी उड़ चली
प्रणय का गीत गाने वाला
गवैया
चिल्लाने लगा
एक छोटी बच्ची को
उसकी माँ ने पीट दिया
मेरे हाथ से छूटते शब्दों ने
साबित कर दिया
कि
उन्हें बंधक बनाया गया है .

Sunday, October 10, 2010

तरक्की पसंद कविता .

तरक्की पसंद कविता
केवल
राजा को ही
क्यों
घेरे ?
क्या
कुछ कम गलती है
मेरे
तेरे ?
राजा एक हो सकता है
या
सात हजार सात सौ सात
पर
परजा की बात
तो
करोड़ों में जाती है
फिर भी
नयी रौशनी नहीं आती है ।
राजा के
सेवक
लठैत
मुनीम
गुमाश्ता
पंडित
हरकारा
में हम नहीं है ।
राजा का उतरन पहनने वाला
कम नहीं है ।
बाहर
राजा जिसे अखरता है ।
घर में
राजा की नक़ल नहीं करता है ?
बाहर
अराजकता
लूट
अन्याय
का शोर है
पर
सच पूछो तो
हमारे अन्दर भी एक चोर है
जो
भूख के नाम पर छीन लाये
रोटी को
खुद डकार जाता है
मगर
वादें लेनिन की करता है ।
कसमें माकी खाता है
- ॐ राजपूत
३१ -८ - २०१०

Saturday, October 9, 2010

bihar chunaw

बीच भवंर में छोड़ा दिया पार्टी की नैया ठाकुर ने ,
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो

bihar chunaw

बीच भवंर में छोड़ा दिया पार्टी की नैया ठाकुर ने ,
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो

Wednesday, October 6, 2010

औरत

औरत
-----
वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है?
गूँध रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गई,
एड़ी घिस रही है
एक औरत अनन्त पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है
एक औरत अंधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोई है
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।
-
चन्द्रकान्त देवताले