Sunday, November 7, 2010

बुढ़िया

एक शब्द है
बुढ़िया
जो

आदरसूचक अर्थ नहीं रखता
मगर
अवस्थाबोध जरुर कराता है
जिसे भिखमंगे जैसी दया की
दरकार होती है
मेरी दादी वही हो गयी है
बुढ़िया
माँ की नज़रों में
वह काम नहीं कर सकती है
इसलिए
पापा कहते है
मुफ्तखोर
फ्लैट के उस कोने में
जहाँ
मै टॉमी को बांधता था
बिस्तर लगा है
बुढ़िया
यानि मेरी दादी का
माँ की जो साड़ी
पहले कामवाली बाई ले जाती थी
अब पहनती है
बुढ़िया
यानी मेरी दादी
कल जब सिन्हा आंटी आयी थी
तो
माँ ने कहा था
उनके गांव की है
बुढ़िया
वह हमेशा राम - राम जपती रहती है
डेली सोप के समय
माँ चीखती है
पागल बुढ़िया
चुप रहो
मै उससे मिल नहीं सकता
वह बीमार है
स्कूल से लौटने पर
उसे दूर से देख सकता हूँ
उसके हाथ कांपते रहते है
वह दिन में कई बार
अपनी गठरी खोलती है
टटोलती है
मानों कुछ
खोज रही हो
और फिर बंद कर देती है
माँ कहती है
काफ़ी भद्दी और लालची है बुढ़िया
एकदम देहाती गंवार है
मगर
बुढ़िया मेरेलिए आश्चर्य है
जब मुझे पता लगा
कि
वह मेरे पापा की माँ है
तो
मुझे विश्वास नहीं हुआ
क्या माँ ऐसी होती है ?
एक दिन
उसने मुझे
पास बुलाकर एक मिठाई दी
और कहा -" खा "
मै खाने को ही था
कि
माँ ने आकर
मेरे हाथ झटक दिए
कहा -
जहर है मत खा
फिर बुढ़िया से कहा
इस मिठाई की तरह
तुम्हारा दिमाग भी सड़ गया है
वह रोज नहीं नहा पाती
वह बदबू देती है
उसके बर्तन अलग हैं
महाराज उसके लिए
अलग से खाना बनाता है
बुढ़िया यानी
मेरी दादी से
कोई बात नहीं करता
सिवाय उस महरी के
जो झाड़ू लगाने आती है
फिर भी
वह बड़बड़ाती रहती है
कभी-कभी
वह रोने लगती है
जबकि
उसे कोई मारता नहीं है
माँ कहती है
नाटक
मैंने जब माँ से पूछा -
बुढ़िया
यहाँ क्यूँ आई है
तो
माँ ने हँसते हुए कहा -
मरने के लिए!
(एक बार फिर अपनी इस कविता को आपके लिए प्रकाशित कर रहा हूँ - ॐ राजपूत)

Saturday, November 6, 2010

समय ठहरा रहेगा तब तक

पूरी गर्मजोशी के साथ
मैं उस क्षण
भी
करूँगा तुम्हारा स्वागत
जब
शरीर मुर्झा चुकी होगी
आँखों ने बोलना
और
मस्तिष्क ने समझाना
बंद कर दिया होगा
एक-एक कर ढेरों
कलैंडर
उतर चुके होंगे दीवार से .
मैं दीवार पर
एक नया कलैंडर खिलाऊंगा
और फूलदान से
बासी फूलों को निकाल
उसमें
ताजे फूलों के साथ
शेष बची जिंदगी को भी
सजा दूंगा.
समय ठहरा रहेगा तब तक.

Thursday, November 4, 2010

और तुम भी


कभी ऐसा भी होता है

कभी ऐसा ही होता है
और
एक रौशनी चली जाती है
बिना किसी को प्रकाशित किये
फिर
हाथ जो बने है
स्पर्श को संज्ञा प्रदान करने के लिए
अनछुए ही लौट आते है
पहलु में
कभी - कभी कोई यायावर
पूरी तैयारी के बावजूद
कहीं नहीं जाता है
और
शहर का सबसे पढ़ा - लिखा व्यक्ति
मर जाता है
किताबों को आलमारी में कैद किये
इधर
रात के प्रहरी की आवाज़
गुज़र जाती है
कानों के बिलकुल करीब से
हम जागते नहीं
फिर
पागलों की जमात में बैठा
नया पागल कहता है
अभी भी वक़्त चाहिए
अभी भी ओ खुदा
तुम्हारी दुनिया बन ही रही है
और तुम भी ।

Tuesday, November 2, 2010

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

दुःख की घड़ी में
मेरे साथ रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
हाथों में लिए
ढाढ़स के अनगिणत शब्द
और
सुख के क्षण में
बिखरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
गंध और स्पर्श के सहारे
जब मैं कटता हूँ दुनिया से
एकमात्र
मेरी कविता मुझसे जुड़ती है
अनुभूति की बाहें फैलाकर
और
जब मैं रमता हूँ दुनिया में
मेरी कविता ही बनती है
माध्यम
अभिव्यक्ति की
शोक में हर्ष में
अपकर्ष और उत्कर्ष में
रण और वन में
हरपल मेरे मन में
विचरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
मैं समाता हूँ
अपनी कविता की इयत्ता में
और यही
दुनिया में अकेली
मेरी परवाह करती है
मैं देता हूँ इसे
रूप
यह देती है मुझे
परिभाषा
दुनिया के सारे
अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग
उस मुकाम पर
पहुँचने का साधन मात्र है
जहाँ
मैं और मेरी प्रेयसी
निर्बाध मिल सके
मेरी प्रेयसी कविता
मेरी अंतिम खोज है .



 

Sunday, October 31, 2010

माँ की बाँहों में

`सुबह की अलसाई नींद
बिस्तर से उतरती है
डगमगाते पैरों की मानिंद
लेती है टेक
आँख खुलने की सच्चाई
आईने पर पसर जाती है
और
रौशनदान से
सूरज की पेशी
पिता की अदालत में
जिंदगी भर देता है
और
एक एक कर
बेपरवाह होने की वजह से
सिमट जाती है
मेरी उम्मीद
माँ की बाँहों में
जो कि
पहली साँस से अनवरत
मुझमे जान फूंकती रही है
और फिर
माँ की हँसी की डोर थामे
उड़ चढ़ता हूँ मैं
आसमान में
और ऊँचा और ऊँचा
उस पतंग की तरह
जिसकी जिंदगी शाम होने पर भी
आसमान से नहीं उतरती

माँ सी धरती

एक नदी उसके गर्भ में
और
सीने में दूध
उसकी जिंदगी से मिलती
साँस
गोद में बसती है नींद
झरनों की लोरी
हवाओं की थपकी
हमें छुपाकर जिन्दा करती
माँ सी धरती .

Friday, October 29, 2010

फिर तुम्हारी याद दस्तक हुई सी जाती है

फिर तुम्हारी याद
दस्तक हुई सी जाती है
और
सिरहाने में सोये
किताब के पन्ने
जी उठते हैं
मेरे जीवन में घटी
जिन घटनाओ के नीचे
लाल स्याही से
तुमने एक लकीर डाली थी
महत्वपूर्ण
हर वह वाकया
इसी किताब में तो रहता है
जिसके हर पन्ने पर
चाँद अपनी चाँदनी
बिखेरता रहता है
फूल
खुद ही आकर
जहाँ खिल उठते हैं
बहार
पूरे बरस बनी रहती है
तुम्हारी याद
इसी कारण
अपनी छुट्टियाँ मनाती है
इस
किताब को जगाकर.

Wednesday, October 27, 2010

कल के चूल्हे के लिए.

एक कवि की आयु छोटी होती है
फिर जो बचता है
वह
एक समझौता है
अवसर और जुगत की जुगलबंदी
जहाँ मुक्तिबोध लोग नहीं ठहरते
एक बार लिखा जाने के बाद
शब्द के अर्थ
निकल चुके होते हैं
केवल वर्तनी ढोयी जाती है.
ताश के पत्ते सरीखा
फेंटा जाता है
शब्द
जिसके बासीपन पर
हरे रंग का लेप लगा
बाजार से ख़रीदे
पानी का छिड़काव किया जाता है
ताकि
पश्चाताप की बेला में
लगे कि
अब भी मुमकिन है
अपनी कविता को बचा पाना
क्योंकि
हम नहीं जानते
कविकर्म का पाप
बनारस में धुलेगा कि नासिक में
पर
लम्बी आयु के दबाव में
कही
लिखी कविता का अर्थ
गुम न हो जाये
इसलिए
हम राख कि ढेर में
छुपा लेते हैं आग
इसतरह बचती है
जिंदगी
कल के चूल्हे के लिए.

कल के चूल्हे के लिए.

एक कवि की आयु छोटी होती है
फिर जो बचता है
वह
एक समझौता है
अवसर और जुगत की जुगलबंदी
जहाँ मुक्तिबोध लोग नहीं ठहरते
एक बार लिखा जाने के बाद
शब्द के अर्थ
निकल चुके होते हैं
केवल वर्तनी ढोयी जाती है.
ताश के पत्ते सरीखा
फेंटा जाता है
शब्द
जिसके बासीपन पर
हरे रंग का लेप लगा
बाजार से ख़रीदे
पानी का छिड़काव किया जाता है
ताकि
पश्चाताप की बेला में
लगे कि
अब भी मुमकिन है
अपनी कविता को बचा पाना
क्योंकि
हम नहीं जानते
कविकर्म का पाप
बनारस में धुलेगा कि नासिक में
पर
लम्बी आयु के दबाव में
कही
लिखी कविता का अर्थ
गुम न हो जाये
इसलिए
हम रख कि ढेर में
छुपा लेते हैं आग
इसतरह बचती है
जिंदगी
कल के चूल्हे के लिए.

तुम शहर में वापस आ गयी हो . (once more)

कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

Monday, October 25, 2010

संजीवनी है तुम्हारी आहट

संजीवनी है तुम्हारी आहट
जिससे जिन्दा होती है मेरी वैयक्तिकता
मै जो करते-करते कार्य
हो जाता हूँ यंत्र,
तब
सामान्य होने का सुख बटोरता हूँ
जब
तुम देती हो
एक छोटी आवाज़
झील के उस पार से
इधर
कमरे में ताज़ी हवा घुस आती है
पुस्तकों में सिमटे शब्द
बिस्तर पर उतर आते हैं
और मैं
करीने से पलटता हूँ
फिर से
अपनी जिंदगी की किताब को
दुनिया की असंख्य संबोधनों में से
यह एक काफी है
जो मुझे मरने नहीं देगी
खास मेरे लिए
जब एक स्वर तैरती है
तुम्हारी
मंदिर में बजती है भोर की घंटी
नदी में उठती है कुंवारी लहर
हवा सोये फूलों को जगा जाती है
और मैं
फिर से गढ़ता हूँ एक परिभाषा
अपने लिए
क्योंकि
जिंदगी ने कम ही दिए हैं
ऐसे मौके
जब
मेरी संवेदना मेरे शरीर को महसूस करती है .

Saturday, October 23, 2010

जो धुँआ उठ रहा है

जब पहचान ही खतरा हो
और भीड़ दंगाई हो
शब्द चुप हो जाते है
मादरे - जुबान की
हम दुबकते हैं नकली खाल में
दोस्त और दुश्मन की सरहद
लथपथ राहों को रोक देती है
फिर क्या गरज
कि
जो धुँआ उठ रहा है
उसमे स्वाद है रोटी के बनने की
या दुर्गन्ध है
चूल्हे के जलने की .

Friday, October 22, 2010

मुफलिसी की नवाबी

जीवन के
सबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप की तरह
आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी भी छोड़ पर बैठ
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उन दिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी

यदि आप यह दावा करते हैं

यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप देख सकते हैं
तब
आपकी आँखे पथरायी
क्यों नहीं है
और
यदि आप यह दावा करते हैं कि
आप बोल सकते हैं
तो
आपकी आवाज़ बैठी क्यों नहीं है
इक्कीसवीं सदी में जिन्दा होने की
मुनादी करवाने वाले आप
मर क्यों नहीं पा रहे हैं
यदि बात ऐसी है तो
आप भी संदेह के परे नहीं है
और
इतिहास
आपकी भागीदारी को भी दर्ज करेगा
क्योंकि
इस बुरे माहौल में
आपने
जीने का तरीका ढूंढ़ लिया है.

Tuesday, October 19, 2010

तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कल
कुछा अजीब - अजीब लगा था
शहर अपना
और
अपनी
बालकनी में फूल भी खिले थे
आज मैंने खुद को
काफी तरोताजा महसूस किया है
और
अपने कोट के कालर पर
एक फूल भी लगाया है
मैंने गुस्सा भी नहीं किया है
अपने नौकर पर
बिलकुल नहीं
बस कुछ पुरानी धुनों को
ताजा कर रहा हूँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
लगता है मुझे
इससे
शायद
तुम शहर में वापस आ गयी हो .

कुछ शब्द

कुछ शब्द
तुम्हे सौंपा था
मैंनेअपना समझ कर
और
तुम्हारे हाथ से
वे छिटक गए
क्योंकि
उनका अर्थ लगाना आसान था

पगडण्डी

घर मेरा बसा है
बस्ती से दूर किसी के पास
जिसके चारो ओर पगडण्डी है
यादों की
जिससे होकर गुजरना
जिंदगी को कई बार जीना है


Friday, October 15, 2010

उम्मीद की लत

शायद हाँ
तुमने लगा दी
उम्मीद की लत
और मेरे हिस्से की हंसी
जो गुम हो गयी थी
एक अजनबी के चेहरे
पर खिलती मिली
मैं फिर से मांग लाया
बरस बाद खुद को हंसाया

Thursday, October 14, 2010

कविता की रेजगारी

जवानी में उसने एक बार समुद्र में
पेशाब किया
और अपना शेष जीवन उसके परिणामस्वरूप
समुद्र की ऊँचाई कितनी बढ़ गयी
यह नापने में खर्च किया

मेरे हाथ से छूटते शब्द

शाम के धुंधलके में
उस दीवार पर
चस्पां दिया गया
फरमान
चाहो तो चले जाओ
अथवा मर जाओ
जहाँ
प्रेमियों ने अपने हाथों
इबारत उगाई थी
मुझे
जिंदगी देने वाली हाथ ने कहा
- हम तुम्हारे कोई नहीं
वक़्त का सूरज
काले लिबास में धंस गया
आँखों की रौशनी उड़ चली
प्रणय का गीत गाने वाला
गवैया
चिल्लाने लगा
एक छोटी बच्ची को
उसकी माँ ने पीट दिया
मेरे हाथ से छूटते शब्दों ने
साबित कर दिया
कि
उन्हें बंधक बनाया गया है .

Sunday, October 10, 2010

तरक्की पसंद कविता .

तरक्की पसंद कविता
केवल
राजा को ही
क्यों
घेरे ?
क्या
कुछ कम गलती है
मेरे
तेरे ?
राजा एक हो सकता है
या
सात हजार सात सौ सात
पर
परजा की बात
तो
करोड़ों में जाती है
फिर भी
नयी रौशनी नहीं आती है ।
राजा के
सेवक
लठैत
मुनीम
गुमाश्ता
पंडित
हरकारा
में हम नहीं है ।
राजा का उतरन पहनने वाला
कम नहीं है ।
बाहर
राजा जिसे अखरता है ।
घर में
राजा की नक़ल नहीं करता है ?
बाहर
अराजकता
लूट
अन्याय
का शोर है
पर
सच पूछो तो
हमारे अन्दर भी एक चोर है
जो
भूख के नाम पर छीन लाये
रोटी को
खुद डकार जाता है
मगर
वादें लेनिन की करता है ।
कसमें माकी खाता है
- ॐ राजपूत
३१ -८ - २०१०

Saturday, October 9, 2010

bihar chunaw

बीच भवंर में छोड़ा दिया पार्टी की नैया ठाकुर ने ,
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो

bihar chunaw

बीच भवंर में छोड़ा दिया पार्टी की नैया ठाकुर ने ,
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो

Wednesday, October 6, 2010

औरत

औरत
-----
वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है?
गूँध रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गई,
एड़ी घिस रही है
एक औरत अनन्त पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है
एक औरत अंधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोई है
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।
-
चन्द्रकान्त देवताले

Sunday, September 19, 2010

क्या हो सकता है .

हमारे आसपास की दुनिया हमें संतुष्ट नहीं करती है । हम महसूस करते है कि चीजे और बेहतर ही सकती है ।
लोगों को लगता है कि उनकी परेशानी बढती जा रही है। लोग अनैतिक होते जारहे है , मूल्यों का पतन हो रहा है ,
रिश्ते टूट रहे है । वे ये भी समझते है कि आधुनिकता ने सबको अँधा बना दिया है । कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी
इस बात को हवा दे रहे है कि हमारी परंपरा हमारी संस्कृति को ख़त्म करने के लिए व्यापक साजिश रची जा रही है। वे इसके लिए पश्चिमी संस्कृति के खुलेपन को जिम्मेवार ठहराते है । देश की एक बड़ी आबादी को बहकाकर
वे समाज में अपनी पहचान कायम करना चाहते है । क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता है की अगर हम उसे गलत समझते है तो हम उसके खिलाफ एकजुट हो , तो आईये उनका विरोध किया जाय अपनी कलम से अपने विचार से । धन्यवाद ।

Sunday, September 12, 2010

बुढ़िया

एक शब्द है
बुढ़िया
जो
आदरसूचक अर्थ नहीं रखता
मगर
अवस्थाबोध जरुर करता है
जिसे भिखमंगे जैसी दया की
दरकार होती है
मेरी दादी वही हो गयी है
बुढ़िया
माँ की नज़रों में
वह काम नहीं कर सकती है
इसलिए
पापा कहते है
मुफ्तखोर
फ्लेट के उस कोने में
जहाँ
मै टॉमी को बांधता था
बिस्तर लगा है
बुढ़िया
यानि मेरी दादी का
माँ की जो साड़ी
पहले कामवाली बाई ले जाती थी
अब पहनती है
बुढ़िया
यानी मेरी दादी
कल जब सिन्हा आंटी आयी थी
तो
माँ ने कहा था
उनके गांव की है
बुढ़िया
वह हमेशा राम - राम जपती रहती है
डेली सोप के समय
माँ चीखती है
पागल बुढ़िया
चुप रहो
मै उससे मिल नहीं सकता
वह बीमार है
स्कूल से लौटने पर
उसे दूर से देख सकता हूँ
उसके हाथ कांपते रहते है
वह दिन में कई बार
अपनी गठरी खोलती है
टटोलती है
मानों कुछ
खोज रही हो
और फिर बंद कर देती है
माँ कहती है
काफ़ी भद्दी और लालची है बुढ़िया
एकदम देहाती गंवार है
मगर
बुढ़िया मेरेलिए आश्चर्य है
जब मुझे पता लगा
कि
वह मेरे पापा की माँ है
तो
मुझे विश्वास नहीं हुआ
क्या माँ ऐसी होती है ?
एक दिन
उसने मुझे
पास बुलाकर एक मिठाई दी
और कहा -" खा "
मै खाने को ही था
कि
माँ ने आकर
मेरे हाथ झटक दिए
कहा -
जहर है मत खा
फिर बुढ़िया से कहा
इस मिठाई की तरह
तुम्हारा दिमाग भी सड़ गया है
वह रोज नहीं नहा पाती
वह बदबू देती है
उसके बर्तन अलग हैं
महाराज उसके लिए
अलग से खाना बनाता है
बुढ़िया यानी
मेरी दादी से
कोई बात नहीं करता
सिवाय उस महरी के
जो झाड़ू लगाने आती है
फिर भी
वह बड़बड़ाती रहती है
कभी-कभी
वह रोने लगती है
जबकि
उसे कोई मारता नहीं है
माँ कहती है
नाटक
मैंने जब माँ से पूछा -
बुढ़िया
यहाँ क्यूँ आई है
तो
माँ ने हँसते हुए कहा -
मरने के लिए!
- ॐ राजपूत





Thursday, June 10, 2010

तुम्हारा साथ, तुम्हारे करीब, तुम्हारी बातें .

जीवन के
सबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप
की तरह आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी छोर पर बैठे
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उनदिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी ।
- ॐ राजपूत
०२-०३-२००१

और तुम भी .

कभी ऐसा भी होता है
कभी ऐसा ही होता है
और
एक रौशनी चली जाती है
bina kisi ko prakashit kiye

और तुम भी .

कभी ऐसा भी होता है
कभी ऐसा ही होता है
और
एक रौशनी चली जाती है
बिना किसी को प्रकाशित किये
फिर
हाथ जो बने है
स्पर्श को संज्ञा प्रदान करने के लिए
अनछुए ही लौट आते है
पहलु में
कभी - कभी कोई यायावर
पूरी तैयारी के बावजूद
कहीं नहीं जाता है
और
शहर का सबसे पढ़ा - लिखा व्यक्ति
मर जाता है
किताबों को आलमारी में कैद किये
इधर
रात के प्रहरी की आवाज़
गुज़र जाती है
कानों के बिलकुल करीब से
हम जागते नहीं
फिर
पागलों की जमात में बैठा
नया पागल कहता है
अभी भी वक़्त चाहिए
अभी भी ओ खुदा
तुम्हारी दुनिया बन ही रही है
और तुम भी ।
- ॐ राजपूत
०८-०८-03

एक कविता

एक कविता
मेरे जीवन में आई है
चलकर
जिसकी चाल
ईश्वर की प्रार्थना की तरह
पवित्र है
एक कविता
जिसे मैंने रखा है
सहेज कर
कभी न मुरझाने वाले
फूलों के साथ
एक कविता
जिन्दा रहती है हमेशा
मेरे बगल में
और
मुझसे बतियाती है
तो
समय थम जाता है
एक कविता
जिसे मैं खोज़ता था
या
एक कविता
जो मुझे खोजती चली आई
वो कविता
तुम्हारी अभिव्यन्ज़क है
जो मेरे सिरहाने उतर गई है
- ॐ राजपूत
२५-०३-०१

एक कविता

एक कविता
मेरे जीवन में आई है
चलकर
जिसकी चाल
ईश्वर की प्रार्थना की तरह
पवित्र है
एक कविता
जिसे मैंने रखा है
सहेज कर
कभी मुरझाने वाले
फूलों के साथ
एक कविता
जिंदा रहती है हमेशा
मेरे बगल मैं
और
मुझसे बतियाती है
तो
समय थम जाता है


एक कविता

एक कविता
मेरे जीवन में आई है
चलकर
जिसकी चाल
ईश्वर की प्रार्थना की तरह
पवित्र है
एक कविता
जिसे मैंने रखा है
सहेज कर
कभी मुरझाने वाले
फूलों के साथ


आदमी के पक्ष का ईश्वर कहाँ है ?

क्यों नहीं जीवन को मिलता है
एक कोना प्यार
जिंदगी
अपने पूरे हिस्से के साथ
हाथ नहीं आती है क्यों
दुनिया में आने पर
जीने की बेबसी क्यों
कौन ले जाता है चुराकर
हमारे हिस्से का रंगीन फूल
आखिर
इससे धरती पर
किसी का क्या सधता है
अगर यह शैतान है
तो
आदमी के पक्ष का ईश्वर कहाँ है ?

Wednesday, June 9, 2010

सेमिनार

अब तो छुट्टी ख़त्म हो गयी है और मैं अपने हॉस्टल में वापस आ गया हूँ । कल से पहले तो आनेवाले १३ तारीख को होनेवाले हिस्टरी सेमिनार के लिए अपना लेख तैयार करूँगा जो वैशाली के इतिहास से सम्बंधित होगा ।

Tuesday, June 8, 2010

ABHISHEK MOLU N BHOLU K LIYE

BHOLU KA MATBAL 20 RUPAYE ME 3 PAAN MOLU KA MATBAL INTERNET PAR PURA DHYAN ABHISHEK KA MATBAL BHAGE CHHURA KAR APNA JAAN

A JOURNEY TO KHAGARIA

THIS WAS MY SECOND VISIT TO KHAGARIA . I WENT TO MY BROTHER'S HOME IN MY SCHOOL VACATION FOR SUMMER. MY NUMPTY BROTHER BHOLU ALWAYS IRRITATES ME AS IT SEEMS THAT HE WILL BECOME A DONKEY IN HIS NEXT LIFE. WE ATE DELICIOUS DISHES TO OUR HEART'S CONTENT. AFTER 5 DAYS OF MY RELAXABLE & MASTI BHARI LIFE I M NOW GOING TO MY NANI GHAR WITH MY MAMA AND BROTHER AS WELL AS SISTER AND MOTHER.